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आखिर क्यों आनंदीबेन पटेल ने दिया इस्तीफा, जानें-कुछ खास वजह

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नई दिल्ली। गुजरात की सीएम आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को सोशल मीडिया पर जैसे ही लिखा कि वो अब मुख्यमंत्री पद से हटना चाहती हैं, गुजरात के सियासी गलियारे में भूंचाल आ गया। आनंदीबेन पटेल के इस्तीफ़ा देने की घोषणा के बाद अब नए मुख्यमंत्री की दौड़ तेज़ हो गई है। नए मुख्यमंत्री की रेस में नितिन पटेल और विजय रूपानी शामिल हैं। आनंदीबेन के इस्तीफे पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा है कि आनंदीबेन ने बढ़ती उम्र की वजह से अपना इस्तीफ़ा दिया है। नए मुख्यमंत्री को लेकर उन्होंने कहा कि इसका फैसला संसदीय बोर्ड करेगा।

इस्तीफा से पहले बड़े फैसले

पहले तो उन्होंने गुजरात में सभी छोटी गाड़ियों पर टोल टैक्स खत्म करने का फरमान सुनाया तो दूसरी बड़ी घोषणा पाटीदारों को लेकर भी की गई जिसमें उन्होंने पाटीदार आंदोलन के दौरान किए गए दंगों के केस में 90 फीसदी मामले वापस लेने का फैसला किया। तीसरा बड़ा फैसला 8 लाख सरकारी और रिटायर्ड सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशी लेकर आया जिसमें आनंदीबेन ने 1 अगस्त से सातवें वेतन आयोग को लागू किए जाने की घोषणा कर दी और चौथी घोषणा आज फेसबुक पर अपनी पोस्ट लिखने से पहले की जिसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा अंक लाने वाली छात्राओं को फ्री हायर एजुकेशन दिए जाने का ऐलान किया।

आइए जानते हैं कि वो कौन सी परिस्थितियां बनीं जिनके चलते आनंदीबेन को अपने इस्तीफे का ऐलान करना पड़ा।

पाटीदार आरक्षण आंदोलन

पिछले एक साल से गुजरात में चल रहे पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल की भूमिका पर ही सवाल खड़े कर दिए थे. 2002 के दंगों के बाद पहली बार पाटीदार आंदोलन के दौरान गुजरात में कर्फ्यू लगा जो कि आनंदीबेन पटेल के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा था। साथ ही पाटीदारों को कंट्रोल करने के लिए सेना तक को तैनात करना पड़ा।

पाटीदार आंदोलन जब उग्र हुआ तो जगह जगह बीजेपी के खिलाफ नारेबाजी हुई. पाटीदार आंदोलन के दौरान भाजपा की अंदरूनी कलह भी बाहर आ गई जिसने आनंदीबेन सरकार को हासिये पर लाकर खड़ा कर दिया. यहां तक कि सरकार पाटीदारों से सुलह का कोई जरिया भी नहीं ढूंढ पाई।

दलित आंदोलन

पाटीदार आंदोलन के बाद गुजरात के ऊना में गौरक्षकों ने जिस तरह दलितों को पीटा और मायावती ने मुद्दे को संसद में उछाला, आनंदीबेन सरकार एक बार फिर बैकफुट पर आ गई। आनंदीबेन सरकार ने आनन फानन में इस केस की जांच सीआईडी को सौंप दी, लेकिन सरकार कुछ और ठोस कदम उठाती, दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतर गए और 25 से ज्यादा लोगों ने सरकार का विरोध करते हुए आत्महत्या का प्रयास किया। यहां तक कि गुजरात में दलित महासम्मेलन हुआ तो उसमें भी भारी तादाद में जुटे दलितों ने आनंदीबेन पटेल सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

75 की एज लिमिट

आनंदीबेन ने अपनी फेसबुक पोस्ट पर 75 साल की उम्र की पार्टी की पॉलिसी की दुहाई देते हुए कहा कि वो खुद अपनी जिम्मेदारी से हटना चाहती हैं। लेकिन नरेंद्र मोदी की करीबी रहीं आनंदीबेन पटेल का यह फैसला मोदी सरकार के लिए भी काफी अहम माना जा रहा है। जानकार यही मान रहे हैं कि आनंदीबेन की ये फेसबुक पोस्ट अचानक नहीं आई है, इसके लिये प्रधानमंत्री के जरिए आनंदीबेन को पूरी तरह भरोसे में लिया गया है कि आनंदीबेन को कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाए।

परिवारवाद का आरोप

आनंदीबेन पटेल के लिए कहा जाता था कि उनकी सरकार उनके बेटे-बेटी चलाते हैं. यहां तक कि उनपर उनकी बेटी अनार पटेल को करोड़ों की वन विभाग की जमीन गलत तरीके से बेटी को देने के आरोप भी लगे। आनंदीबेन पटेल की बेटी को जमीन देने के मुद्दे को कांग्रेस ने इस कदर उछाला कि केंद्र में मौजूद मोदी सरकार को जवाब देना पड़ा।

जानकार मानते हैं कि आनंदीबेन पटेल को अब किसी राज्य का गवर्नर बनाया जा सकता है। वैसे यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि आनंदीबेन के लिए प्रधानमंत्री ने क्या भूमिका तय की है।