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अयोध्या विवाद के पक्षकार रहे हाशिम अंसारी का अयोध्या में निधन

hashimansari
नई दिल्ली। राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में मुद्दई करने वाले हाशिम अंसारी का निधन हो गया है। 96 साल की उम्र में उन्होंने अयोध्या में अंतिम सांस ली। लंबे समय से वो सांस और दूसरी शारीरिक दिक्कतों का सामना कर रहे थे। 1949 से वो इस मुद्दे की पैरोकारी कर रहे थे।

अभी भी फैसले का इंतजार

“मैं फैसले का भी इंतजार कर रहा हूं और मौत का भी लेकिन यह चाहता हूं मौत से पहले फ़ैसला देख लूं।” ये शब्द थे 90 साल के बुज़ुर्ग हाशिम अंसारी के। साठ साल से बाबरी मस्जिद की क़ानूनी लड़ाई लड़ रहे 90 वर्षीय हाशिम गज़ब के जीवट के आदमी थे।

हाशिम अयोध्या के उन कुछ चुनिंदा बचे हुए लोगों में से थे। जो लगातार 60 वर्षों से अपने धर्म और बाबरी मस्जिद के लिए संविधान और क़ानून के दायरे में रहते हुए अदालती लड़ाई लड़ रहे थे।

कई पीढ़ियों से था अयोध्या में आशियाना

हाशिम का परिवार कई पीढ़ियों से अयोध्या में रह रहा है। वो 1921 में पैदा हुए, 11 साल की उम्र में सन् 1932 में उनके पिता का देहांत हो गया था। दर्जा दो तक पढाई की, फिर सिलाई का काम करने लगे। यहीं पड़ोस में फैजाबाद में उनकी शादी हुई। उनके दो बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी। उनके परिवार की आमदनी का कोई खास ज़रिया नहीं है।

छह दिसंबर, 1992 के बलवे में बाहर से आए दंगाइयों ने उनका घर जला दिया, पर अयोध्या के हिंदुओं ने उन्हें और उनके परिवार को बचाया था। जो कुछ मुआवज़ा मिला उससे हाशिम ने अपने छोटे से घर को दोबारा बनवाया और एक पुरानी अम्बेसडर कार खरीदी।

बेटा मोहम्मद इक़बाल इसे टैक्सी के तौर पर चलाते है, वह अक्सर हिंदू तीर्थयात्रियों को इसी टैक्सी में अयोध्या के मंदिरों के दर्शन कराते हैं। हाशिम अंसारी कहा करते थे कि उन्होंने बाबरी मस्जिद की पैरवी कभी राजनीतिक फायदे के लिए नहीं की थी। उनके एक साथी बताते हैं कि छह दिसंबर, 1992 के बाद एक बड़े नेता ने उनको दो करोड़ रुपए और पेट्रोल पम्प देने की पेशकश की तो हाशिम ने न केवल ठुकरा दिया बल्कि उस संदेशवाहक को दौड़ा दिया।

सादगी का रहन-सहन

हाशिम अंसारी और उनके परिवार का रहन-सहन नहीं बदला। उनके छोटे से कमरे में दो तखत पड़े हैं। यही उनका ड्राइंग रूम है और यही बेड रूम। दीवार पर बाबरी मस्जिद की पुरानी तस्वीर टंगी है और घर के बाहर अंग्रेज़ी में बाबरी मस्जिद पुनर्निमाण समिति का बोर्ड।

90 साल की उम्र में भी उनकी याददाश्त दुरुस्त थी। 1934 का बलवा भी उन्हें याद था। जब हिंदू वैरागी सन्यासियों ने बाबरी मस्जिद पर हमला बोला था। वो बताते थे कि ब्रिटिश हुकूमत ने सामूहिक जुर्माना लगाकर मस्जिद की मरम्मत कराई और जो लोग मारे गए उनके परिवारों को मुआवज़ा भी दिया।

सन 1949 में जब विवादित मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखी गई, उस समय प्रशासन ने शांति व्यवस्था के लिए जिन लोगों को गिरफ़्तार किया, उनमे हाशिम भी शामिल थे। हाशिम कहते थे कि वो मेलजोल रखने वाले हैं इसलिए लोगों ने उनसे मुक़दमा करने को कहा और इस तरह वो बाबरी मस्जिद के पैरोकार हो गए।

‘हर हाल में अमन’

बाद में 1961 में जब सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने मुक़दमा किया तो उसमे भी हाशिम एक मुद्दई बने। पुलिस प्रशासन की सूची में नाम होने की वजह से 1975 की इमरजेंसी में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया और आठ महीने तक बरेली सेंट्रल जेल में रखे गए। यह भी एक वजह हो सकती है कि हाशिम ने कांग्रेस को कभी माफ़ नही किया। बाबरी मस्जिद मामले में हर क़दम पर वह कांग्रेस को दोषी मानते थे।

हाशिम सभी पार्टियों के मुस्मिल नेताओं के भी आलोचक थे। वो बार-बार जोर देते थे कि हर हालत में वो अमन चाहते हैं। मस्जिद तो बाद की बात है। हाशिम कहते थे कि अगर वो मुक़दमा जीत गए तो भी मस्जिद निर्माण तब तक नहीं शुरू करेंगे, जब तक कि हिंदू बहुसंख्यक हमारे साथ नहीं आ जाते।

हाशिम अपने जीवन के अंतिम समय में अपनी निजी सुरक्षा को लेकर भी चिंतित थे। उनका कहना था कि उन्हें अयोध्या के लोगों से नहीं बल्कि बाहर के लोगों से ख़तरा है, जो माहौल बिगाड़ने के लिए कुछ भी कर सकते हैं ताकि मुसलमान डर जाएं।

हाशिम को शिकायत है कि पहले उनकी सुरक्षा में तैनात तीनों सिपाहियों के पास हथियार थे। अब उत्तर प्रदेश सरकार ने दो हथियार वापस ले लिए हैं। एक हथियार है जिससे तीनों सिपाही बारी-बारी से आठ आठ घंटे डयूटी देते हैं। हाशिम को आश्वस्त करने के लिए स्थानीय पुलिस अफसरों ने उनके घर के बगल ही पुलिस पिकेट तैनात कर दी है। इसके बावजूद हाशिम के चेहरे पर चिंता के भाव थे। हाशिम पहले कभी इतना चिंतित नहीं दिखे।